मोदीजी 1947 के बाद से भारत मे प्रगति होने लगी कई कारखाने फेक्टरिया बनी, साथ ही बांधकाम यानी construction & infrastructure में भी काफी उन्नति हुई तब हमारे देश मे कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के लिए कोई[occupational Safety} सुरक्षा सुविधा नहीं दी जाती थी. 1966 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् का गठन हुआ और नाम मात्र की सुरक्षा किताबो में चालू हुई. 1984 मे जब भोपाल गैस कांड के बाद मिनिस्ट्री ऑफ लेबर का इस ओर ध्यान गया, और तब पता चला कि हमारे देश मे कोई भी कंपनी सुरक्षा {Occupational Safety} पे ध्यान नही देतीं,और तब ये कानून और भी सख्त हुए लेकिन कामयाब नहीं, क्यूकी कम्पनियाँ सुरक्षा के खर्चो से बचना चाहती थी लेकिन कई कम्पनियों ने सुरक्षा को आत्मसात किया. आज सन 2018 भारत एक प्रगतिशील देश इतना आगे बढ़ रहा है लेकिन आज भी यहा सुरक्षा पे ध्यान नहीं दिया जाता, रोजाना कई मजदूर फेक्टरी, बांधकाम, और कम्पनी मे गंभीर चोट से घायल हो जाते हैं और कुछ तो स्वर्गवास भी चले जाते हैं. अब समय है बदलने का और निजी क्षेत्र के साथ साथ सरकारी क्षेत्रों मे सुरक्षा Occupational Safety को बढ़ावा देने का जिससे मजदूर खुशी खुशी हर रोज पैसे कमा कर अपने घर सुरक्षित अपने परिवार के पास जा सके. हमारे देश मे सुरक्षा के कानून है जरूरत है उसमे नए बदलाव की, Safety Officer के शिक्षा पात्रता को निर्धारित करने की, Safety Officer के अनुपात को 500/1 से 100/1 krne ki. एक अच्छी पहल महाराष्ट्र मे हुई है के वहा फेक्टरी में Safety Officer का अनुपात 250 पर 1 किया गया है लेकिन जरूरत है इसे 100 मजदूर पर 1 Safety Officer करने की. आशा करता हू के मेरे और मेरे जेसे कई देश का हित सोचने वाले Safety Officers मजदूर का ये सच, जरूरत और मजदूरों के व्यथा ka ये संदेश आप तक पहुचे |जय सुरक्षा